श्री समर्थ साहेब दूलन दास जी के पिता का नाम श्री रायसिंह था तथा आप के चार भाई थे सबसे बड़े भाई का नाम (1) श्री कौशल सिंह (2) श्री प्रीतम सिंह (3) भीष्म सिंह (4) समर्थ साहेब दूलन दास सबसे छोटे भाई थे बड़े भाई कौशल सिंह तिलोई नरेश के यहां उच्च पद पर कार्यरत थे कौशल सिंह की इमानदारी और कार्यकुशलता से प्रसन्न तिलोई नरेश ने 100 बीघा जमीन दान की थी जहां पर आज घर्में धाम स्थित है युवावस्था में साहेब दूलन दास कुंडा नरेश के यहां उच्च पदासीन एवं राजा के विश्वसनीय सदस्यों में परिवार की भांति रहा करते थे एक बार शत्रु राजा के आक्रमण करने पर गोंडा नरेश को जान बचाने के लिए अन्यत्र शरण लेनी पड़ी राजमहल को शत्रु सेना ने घेर लिया बचने का कोई रास्ता ना देख महारानी ने दूलन दास जी से प्रार्थना की और कहा अब आप ही कुछ कर सकते हैं अन्यथा मुझे जौहर के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा है अतः साहेब दूलन दास गुप्त मार्ग से महारानी को लेकर महल से निकले पर मार्ग में सरयू नदी उफान पर थी और कोई नाव नही थी महारानी ने कहा अब तो शत्रु सेना अवश्य ही पीछा करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लेगी परंतु साहेब दूलन दास ने सरयू नदी से प्रार्थना की और तक्षण ही नदी का पानी सूख गया महारानी 6 माह से अधिक सैम्बसी में निवास कर सुरक्षित रही और युद्ध विराम के बाद वापस जाकर महाराज को दूलन दास की अध्यात्मिक शक्तियों व सिद्धियों का गुणगान महाराज से किया
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Wednesday, March 20, 2019
कीर्ति गाथा
श्री समर्थ साहेब दूलन दास जी के पिता का नाम श्री रायसिंह था तथा आप के चार भाई थे सबसे बड़े भाई का नाम (1) श्री कौशल सिंह (2) श्री प्रीतम सिंह (3) भीष्म सिंह (4) समर्थ साहेब दूलन दास सबसे छोटे भाई थे बड़े भाई कौशल सिंह तिलोई नरेश के यहां उच्च पद पर कार्यरत थे कौशल सिंह की इमानदारी और कार्यकुशलता से प्रसन्न तिलोई नरेश ने 100 बीघा जमीन दान की थी जहां पर आज घर्में धाम स्थित है युवावस्था में साहेब दूलन दास कुंडा नरेश के यहां उच्च पदासीन एवं राजा के विश्वसनीय सदस्यों में परिवार की भांति रहा करते थे एक बार शत्रु राजा के आक्रमण करने पर गोंडा नरेश को जान बचाने के लिए अन्यत्र शरण लेनी पड़ी राजमहल को शत्रु सेना ने घेर लिया बचने का कोई रास्ता ना देख महारानी ने दूलन दास जी से प्रार्थना की और कहा अब आप ही कुछ कर सकते हैं अन्यथा मुझे जौहर के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा है अतः साहेब दूलन दास गुप्त मार्ग से महारानी को लेकर महल से निकले पर मार्ग में सरयू नदी उफान पर थी और कोई नाव नही थी महारानी ने कहा अब तो शत्रु सेना अवश्य ही पीछा करते हुए उन्हें गिरफ्तार कर लेगी परंतु साहेब दूलन दास ने सरयू नदी से प्रार्थना की और तक्षण ही नदी का पानी सूख गया महारानी 6 माह से अधिक सैम्बसी में निवास कर सुरक्षित रही और युद्ध विराम के बाद वापस जाकर महाराज को दूलन दास की अध्यात्मिक शक्तियों व सिद्धियों का गुणगान महाराज से कियाकीर्ति गाथा 17
समर्थ साहेब दूलन दास के इकलौते पुत्र श्री राम बक्स दास साहेब हुए साहेब राम बक्सदास जी जन्मजात सिद्ध संत थे कहते हैं वह छोटे बच्चों के साथ खेल खेल में ही मिट्टी की चिड़िया बनाकर आकाश में उड़ा देते थे जब इस बात की सूचना समर्थ साहेब दूलन दास को लगी तो समर्थ साहेब दूलन दास ने साहिब राम वख्श दास जी को बुलाकर ऐसा कभी ना करने का संकल्प दिलाया और उन्हें उपदेश दिया कि समस्त सिद्धियां या ईश्वरीय लीलाएं इस तरह से खेल खेल में प्रयुक्त करने के लिए नहीं होती ईश्वरीय लीलाओं का प्रयोग सिर्फ लोक कल्याण और समाज के हितार्थ ही करना चाहिए 90 वर्ष की अवस्था में समर्थ साहिब राम बक्सदास जी सतलोक लीन हुए इसके पश्चात साहेब बरतबली (ब्रत बली) जी धर्मे धाम के महंत हुए साहेब बरतबली भी गृहस्थी में रहकर नित्य प्रति 25 संतों के साथ ही प्रसाद ग्रहण करते थे यह आपका नित्य का नियम था जो साहेब बरत बली जी ने आजीवन बखूबी निभाया था बरत बली साहेब के सतलोक लीन होने पर साहेब जगजीवन प्रसाद जीने महंती का कार्यभार संभाला तत्पश्चात पांचवी पीढ़ी में साहेब भगवान दास जी और छठवें पीढ़ी में साहेब नारायण दास जी हुए जो सन् 1978 ईस्वी में सतलोक लीन हुए वर्तमान समय में इन्हीं साहब की दो पुत्रियां बिमला दास व स्वर्गीय उर्मिला दास और दामाद माननीय राम किशोर दास स्वर्गीय सत्य नारायण दास भदोरिया साहब के जेष्ठ पुत्र माननीय तेज प्रताप दास धर्मे धाम में वर्तमान समय में गद्दी का कार्यभार संभाले हुए हैंकीर्ति गाथा 16
समर्थ साईं जगजीवन दास साहेब जब सतलोक लीन हुए तब उस समय संयोग बस साहेब दूलन दास नहीं पहुंच पाए अतः अंतिम दर्शन नहीं हो सका कुछ दिन पहले ही साहेब दूलन दास जी शिष्यों के साथ समर्थ साईं जगजीवन दास साहेब के दर्शन हेतु निकले थे परंतु समर्थ साईं जगजीवन दास ने संदेशवाहक को भेजकर कहला दिया के मुझ में तुम में कोई भेद नहीं कोई अंतर नहीं अत: वापस लौट जाओ और घर से ही ध्यान सुमिरन करो और संप्रदाय संभालो अतः साहब दूलन दास आधे रास्ते से ही वापस आ गए थे पर समर्थ साईं के सतलोक लीन होने का समाचार सुनते ही सन्न रह गए आनन फानन में सब कुछ छोड़ कर रोते बिलखते कोटवा धाम पहुंचे और समर्थ साईं जगजीवन दास की समाधि पकड़कर रोने लगे तब समर्थ साहेब जगजीवन दास जी प्रकट हुए और उन्हें उपदेश आदि करते हुए धैर्य बंधाया और भक्तों के रक्षार्थ भी उपदेश दिया और शांत चित्त होकर धैर्य पूर्वक घर वापस जाने के लिए कहा समर्थ साहेब जगजीवन दास का आदेश मानकर साहब दूलन दास धर्मे धाम वापस आ गए एक दिन ध्यान सुमिरन के समय समर्थ साईं जगजीवनदास दंडी स्वामी के रूप में प्रकट हुए तब साहेब दूलन दास ने पहचान कर चरण वंदना करते हुए विचित्र वेशभूषा के बारे में पूछा तब समर्थ साहब ने दूलनदास ने कहा यह सब तो भक्तों के लिए करना ही पड़ता है पर आप सतनाम पंथ के वेशभूषा और भक्तों की रक्षा करना अब संप्रदाय के कर्ताधर्ता और संप्रदाय को संभालने वाले आप ही हो ""भक्ति भाव बस जगजीवन दूलन का बर दीन्ह अपने भेष अरू पंथ का मालिक तुम कहं कीन्ह ""कीर्ति गाथा 15
सतनाम पंथ के सिरमौर सरदार दूलन दास जी के शिष्य तोमर दास जी हुए जो बड़े ही सिद्ध महात्मा थे। तोमर दास जी के शिष्य गंगादास ने नागपुर में पहुंचकर एक बस्ती के किनारे अपनी कुटी बनाई और एक कुआं भी खुदवाया। जिसका जल बड़ा मीठा और स्वादिष्ट था। जबकि शहर में जितने भी हुए थे उनमें खारा पानी था। यह कौतुक देखकर शहर के लोगों ने जाकर राजा से कहा कि महाराज एक फकीर ने यहां आकर अपनी कुटी बनाई और कुआं खुदवाया जिसका जल बहुत मीठा है। परंतु उसने बिना आपकी आज्ञा के आप के राज में कुटी बनाई और कुआं खुदवाया। यह सुनकर राजा ने आदेश दिया कि इसी समय उस फकीर को उस जगह से निकाल दो और वह कुआं जप्त कर राजभवन की जल आपूर्ति हेतु उपयोग में लाया जाए। दरबारियों ने जब यह आदेश गंगादास जी को सुनाया तो वह बोले कि यदि मैं यहां नहीं रहूंगा तो जल नहीं रहेगा। यह कहकर उन्होंने वह स्थान त्याग करने का मन बनाया साथ ही यह भी कहा कि जिस प्रकार तुम लोगों ने आकर मेरे स्थान पर उत्पात मचाया है, इसी प्रकार राज्य में भी कोई उत्पाद आएगा। यह कहकर वहां से चल दिए तो उसी समय वह कुआं सूख गया। यह देख सभी लोग भयभीत हो गए और राजा को पूरा हाल बताया। उसी समय बड़े जोर की आंधी आई जिससे राजा की फुलवारी समेत सभी पेड़-पौधे उखड़ गए। जिनमें से एक आम का वृक्ष जिसके फल राजा को बहुत पसंद थे वह भी गिर गया। यह देख राजा ने आदेश दिया कि उस फकीर को पकड़कर फुलवारी में बिठा दो और कहो कि हमारे मनपसंद आम का पेड़ फिर उठ खड़ा हो जाए, तभी उसे जाने दिया जाएगा। सिपाहियों ने गंगादास को ढूंढ कर पकड़ लिया और लाकर फुलवारी में बैठाकर राजा का आदेश सुना दिया। गंगादास जी ने रात्रि के समय ध्यान में समर्थ हो जगजीवन साहब जी से प्रार्थना की बाना की लाज रखिए मैं यहां पर असहाय और अनाथ हूँ उसी समय स्वामी जी ने प्रत्यक्ष दर्शन देकर आशीर्वाद दिया कि दुखी मत हो जो तुम्हारी इच्छा होगी वह पूरी होगी। और अपने हाथ से दो अशरफिया गंगा दास को देकर कहा कि इससे यहां पर साधु संतों का भंडारा करना। दूसरे दिन प्रातः काल उस गिरे हुए पेड़ के पास गंगादास जी गए और बोले कि "तुमको आंधी ने गिराया, मुझको राजा ने पकड़ा, तुम उठो, तो हम छूटें।" उसी समय वह पेड़ उठकर सीधा खड़ा हो गया। उसी स्थान पर एक टूटे वृक्ष की टहनी उठाकर दातुन की और दातुन के दो टुकड़े जमीन में गाड़ दिया। जिससे पत्ते निकल आए और वह पेड़ बन गया तथा स्वामी जी से प्राप्त दो अशरफिया सिपाहियों को देकर भंडारे का सामान मंगवाया और शहर के सभी साधू संतो को भंडारे में आमंत्रित किया। स्वामीजी का नाम लेकर प्रसाद वितरण शुरू किया। जब 5000 व्यक्ति भोजन पा चुके और भोजन कम ना हुआ तो उसे गरीबों और कंगालों में बॅटवा दिया। जिससे गंगादास जी की प्रसिद्धि पूरे शहर में फैल गई। यह सुनकर राजा ने आकर गंगादास जी के चरण स्पर्श कर क्षमा याचना की और विनती कि मेरे पुत्र को अपना शिष्य बनाइए और इसी फुलवारी में निवास करिए। गंगादास जी ने इसे स्वीकार कर लिया और तभी से वहां के सभी कुओं का जल मीठा हो गया। तथा तीनों वृक्ष इतने प्रसिद्ध हुए कि लोग उनका दर्शन करने आने लगे। और मेला लगने लगा।
कीर्ति गाथा 14
समर्थ साहिब दूलन दास के शिष्यों में साहेब ढ़ाकूदास का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है साहेब ढ़ाकूदासदास जाति से कुम्हार थे एवं घड़े आदि मिट्टी के बर्तन बनाते थे आप चलते-फिरते उठते बैठते सदा ही नाम उपासना में लीन रहते थे तथा लोगों को भी यही कहते थे कि "राम नाम रटे जाए आपन काम केहे जाए का काहू को डर है "एक बार की बात है कि अमेठी के महाराज शिकार खेलने जायस की सीमा पर जंगलों में आए साथ में कुछ सैनिक और सेवादार भी थे राजा साहब ने सैनिकों से कहा जाओ जाकर बर्तन हांडी आदि का प्रबंध करो सैनिक कुम्हार का पता पूछते पूछते साहेब ढ़ाकूदास के पास पहुंचे और बोले बाबाजी हंडिया बर्तन आदि सब लेकर जल्दी पहुंचो राजा साहब अमेठी से पधारे हैं तब साहेब ढ़ाकूदास ने कहा भाई हंडिया बर्तन जितने चाहो उतने ले जाओ पर अब मैं बूढ़ा हो गया हूं मुझ से भार नहीं उठाया जाता पर हठी और जिद्दी सैनिकों को बूढ़े कुम्हार पर तरस नहीं आया और वह धमकाने लगे मरता क्या ना करता साहेब ढ़ाकूदास ने खैंची (बांस की बनी बड़ी टोकरी )में सारे बर्तन रखे और सिर पर उठाए चलने लगे सैनिक आगे आगे साहेब ढ़ाकूदास पीछे पीछे जब सैनिक राजा साहब के पास पहुंचे तब राजा साहब ने पूछा बर्तन ले आए इस पर सैनिकों ने ढ़ाकूदास की तरफ इशारा करते हुए कहा कुम्हार लेकर आ ही रहा है महाराज, अब महाराज और सभी कुम्हार (साहेब ढ़ाकूदास) की तरफ देखने लगे बड़ा ही आश्चर्यजनक और अद्भुत नजारा था साहेब ढ़ाकूदास कमर झुकाए कंधे पर लट्ठ रखे हुए चल रहे थे पर खैंची उनके सिर से 2--3 हाथ ऊपर ऊपर चल रही थी समीप आते ही खैंची जमीन पर आ गई साहेब ढ़ाकूदास ने हाथ जोड़ते हुए कहा आपकी सेवा में हाजिर हूं महाराज पर राजा साहब सैनिकों की करतूत से बहुत लज्जित हो चुके थे और क्षमा मांगी तथा माफीनामे में गांव और जमीन देने का आग्रह करने लगे परंतु ढ़ाकूदास ने पारिश्रमिक के अतिरिक्त कुछ भी ना लिया साहेब ढ़ाकूदास की समाधि आज भी जायज कस्बे में है लोगों में आज भी इस महा नामोंपासक के लिए श्रद्धा है धन्य है ऐसे सतनामी और त्यागी संत|कीर्ति गाथा 13
समर्थ साहेब जगजीवन दास का एक कुर्मी भक्त था उसे इकलौता पुत्र था और उसे अपने पुत्र से कुछ ज्यादा ही प्रेम था पर ईश्वरीय गति को कौन जाने एक दिन उसका का पुत्र ईश्वर को प्यारा हो गया रोते बिलखते अपने पुत्र का शव लेकर समर्थ श्री जगजीवन दास के दरबार पहुंचा समर्थ साईं जगजीवन दास के पांच पुत्रों में से स्वयं के चार पुत्र सतलोक लीन हो चुके थे और समर्थ साहेब जगजीवन दास प्रत्यक्ष चमत्कारों के प्रबल विरोधी थे और अपने शिष्यों से भी कहते थे कि तपोबल और सिद्धियां प्रदर्शन का विषय वस्तु नहीं है यह दीनों, असहायों और लोक कल्याण के हेतु ही प्रयुक्त करना चाहिए उसने ने एक भक्त की घटना देख रखी थी एक बार एक टीडीदासनाम के भक्त के इकलौते पुत्र का निधन होने पर वह आकर अत्यधिक करुण विलाप करने लगा समर्थ साईं से उसकी करुण दशा देखी ना गई तो उससे कहा जाओ उसके सामने सत्यनाम का जप करो सत्यनाम सुमिरन ना छोड़ो यदि उसकी आयु शेष होगी तो वह जीवित हो जाएगा और उस भक्त के द्वारा सतनाम का सुमिरन करते ही वह जीवित हो गया था इसी आशा विश्वास और श्रद्धा में आज ये समर्थ साईं के चरणों पर शीश रख कर लेटे हुए थे समर्थ साईं जगजीवन दास ने बहुत उपदेशों से समझाने का प्रयास किया किंतु सब विफल रहा अंतत: समर्थ साईं जगजीवन दास ने साहिब दूलन दास को इशारा किया और साहब दूलन दास ने कुर्मी के पुत्र को पैरों से स्पर्श करते हुए कहा "कितना सोते हो तुम्हारे पिता कितने परेशान हैं "और कोई हरकत ना होते देख साहब दूलन दास ने पैर से एक ठोकर मार दी और बोले "इतना भी कोई सोता है क्या जल्दी उठऔर घर जा" कुर्मी का पुत्र जी उठा और पिता पुत्र जयकारा लगाते हुए घर आएकीर्ति गाथा 12
समर्थ साहेब दूलन दास विदेह थे कहते हैं आपके शरीर पर अग्नि वायु जल भयंकर विष आदि का कोई भी प्रभाव ना होता था और आपका मन भी विकारों से रहित था कीरत सागर में वर्णित एक कथा आती है कि एक बार समर्थ साहिब दूलन दास कर्मदहन सागर की ओर स्नान हेतु जा रहे थे मार्ग में एक ब्राह्मण स्त्री समर्थ साहब जगजीवन दास के गुण शील और स्वभाव का वर्णन करते हुए एक भजन गा रही थी उस ब्राह्मण स्त्री के मुख से समर्थ साईं जगजीवन साहब के गुण वाले भजन सुनकर साहब दूलन दास अत्यंत ही प्रसन्न हो गए और आनंद बस अश्रुपूरित होकर उस ब्राह्मण स्त्री के चरण पकड़ लिये और बोले तुम धन्य हो जिसने समर्थ साईं जगजीवन दास की महिमा को जान लिया पास ही खड़े कई लोग यह दृश्य देख रहे थे जिनमें से एक व्यक्ति ने कहा धन्य है दूलन की भक्ति जो अपने गुरु का नाम सुनकर ही पुलकित हो जाते हैं किंतु दूसरे व्यक्ति ने कहा "अरे नहीं वह तो उस ब्राह्मण स्त्री के रूप और यौवन पर मुक्ध हो गए इसलिए चरण पकड़ लिया समर्थ साहिब दूलन दास अपने मुख के सामने ही यह सब बातें सुन रहे थे पास ही एक ठठेरा तांबा सीसा आदि गला रहा था समर्थ साहिब दूलन दास ने उठाकर पिघला हुआ कांच पी लिया यह दृश्य देखकर निंदा करने वाले और सभी लोग घबरा गए परंतु समर्थ साहिब दोलन दास जी विना कुछ हुए वही खड़े रहे और बोले मेरी देह पर ऐसी किसी वस्तु का कोई प्रभाव नहीं ना ही मेरे मन पर किसी विकार आदि का प्रभाव है मैंने यह शीशा मात्र प्रदर्शन के लिए नहीं पिया किंतु मुझसे संप्रदाय का अपमान बर्दाश्त ना हुआ अत: आपको बताने के लिए किया कि सतनामी संतों के ऊपर ऐसी किसी वस्तुओं का प्रभाव नहीं रहता आपने अपनी सद्बुद्धि से जिस तरह मेरा आकलन करना था किया मुझे ऐसी निंदा या स्तुति से कोई प्रभाव नहीं पड़ता यह देखकर सभी समर्थ साहिब दूलन दास से क्षमा याचना करने लगेFriday, March 8, 2019
मंसा दास उद्धार
समर्थ साहेब जगजीवन दास जी की साहेब दूलन दास पर विशेष कृपा थी साहेब दूलन दास की भक्ति नाम सुमिरन सेवा भाव व विनम्रता आदि से साईं जगजीवन दास बहुत प्रसन्न रहते थे एक दिन साईं जगजीवन दास ने साहिब दूलन दास को बुलाकर कहा दुलारे कुशभर गांव में साहिब मंसा दास जी रहते हैं आप उनका सदा ही ख्याल रखना और उन्हें संभालते रहना अगर कोई गलती भी हो जाए तो सहायता करना साहेब दूलन दास ने जो आज्ञा स्वामी कहकर आदेश शिरोधार्य कर लिया इस घटना के कुछ समय पश्चात ही समर्थ साहेब जगजीवन दास परमधाम सतलोक लीन हुए और उसके कुछ दिनों पश्चात एक असहाय निराश्रित निर्धन ब्राह्मणी साहेब मंसा दास की कुटी के समीप ही झोपड़ी बनाकर रहने लगी इस बात की शिकायत गांव के लोगों ने साहिब जलाली दास (पुत्र साहिब श्री जगजीवन दास जी) से की कि साहिब मनसा दास जी के उस स्त्री से अनैतिक संबंध हैं इसलिए उन्हें इस संप्रदाय से निकाला जाए यह सुनकर समर्थ साहिब जलाली दास ने यह आदेश दिया कि आज से कोई भी साहेब मंसा दास को सतनामी ना बुलाएगा और ना ही उनके यहां जाएगा क्योंकि उन्होंने सतनाम पंथ के विरुद्ध कार्य किया है यह बात जब साहिब मन्सा दास ने सुना तो बहुत दुखी हुए तत्कालिक सामाजिक रीतियों के अनुरूप साहिब मंसा दास ने विचार किया कि भंडारा करना चाहिए जिससे इस प्रकार के दोषों का प्रायश्चित हो सके यह सोचकर उन्होंने साधु संतों और ब्राह्मणों को निमंत्रण भेजा पर किसी ने भी निमंत्रण स्वीकार नहीं किया सभी ने साहिब मंसा दास जी के यहां जाने से मना कर दिया असहाय और दुखी होकर मंसा दास साहेब दूलन दास के पास पहुंचे और उन्हें पूरा वृतांत कह सुनाया जिसे सुनकर साहिब दूलन दास को स्वामी जी की कही हुई बात का पूरा स्मरण हो आया साहेब दूलन दास ने निश्चित समय पर भंडारे में आने का आश्वासन दिया और उन्हें विदा कर दिया और निश्चित समय पर बहुत से साधु संतों को लेकर भंडारे हेतु पहुंच गए तत्पश्चात साहिब दूलन दास ने एक भक्त को बुलाकर कहा कि वह शीघ्र ही जाकर साहेब जलाली दास से प्रार्थना करें कि बहुत से सतनामी साधु संत आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं आप शीघ्र चलिए यदि आप नहीं आएंगे तो आज समर्थ साहेब जगजीवन सरकार को ही भक्तों की लाज बचाने के लिए आना पड़ेगा यह साहिब दूलन दास की प्रतिज्ञा है यह सुनकर भक्त चल पड़ा इधर साहिब जलाली दास को समर्थ साहेब जगजीवन दास ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि दुलारे (दूलन दास )साहेब मंसा दास के यहां साधु संतों के साथ पधारे हैं और तुम सो रहे हो उनका भक्त यहां आ रहा है जल्दी उठो अन्यथा बात नहीं बनेगी भक्त के यहां पहुंचने की प्रतीक्षा किए बिना तुम शीघ्र ही मंसा दास जी के यहां पहुंच जाओ आदेश देकर साहेब जगजीवन दास जी अंतर्ध्यान हो गए समर्थ साहिब जलाली दास आश्चर्य से उठ बैठे और अविलंब मंसा दास की कुटिया की ओर चल पड़े साहेब जलाली दास को देखते ही साधु संतों व भक्तों में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई सबने साहेब के नाम का जयकारा लगाया और भरी सभा में साहिब दूलन दास ने वर्षों पूर्व दिए गए समर्थ स्वामी जगजीवन दास के आदेश का व्याख्यान सभी के सम्मुख रखा इस तरह प्रसन्नता पूर्वक साहेब मंसा दास का भंडारा संपन्न हुआ और साहेब दूलन दास की कृपा से उन्हें कलंक से मुक्ति मिली
सादर बंदगी
गधे का अश्व मे परिवर्तित होना
समर्थ साहेब दूलन दास का नित्य का नियम बन गया था वह अपने भक्तों के साथ जाकर कर्म दही में स्नान करते थे एक बार की बात है कि समर्थ साहेब दूलन दास अपने भक्तों के साथ कर्म दही सागर में स्नान करने गए हुए थे वहीं पर गांव के भी कुछ लोग इकट्ठे हुए थे जो कुछ ही दूर पर आपस में हास परिहास में लगे थे साहेब दूलन दास का एक भक्त दातुन तोड़ने गया तो उन लोगों ने आपस में कहना शुरू किया कि सुनते हैं कर्म दही में स्नान करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं तभी दूसरे व्यक्ति ने उपहास उड़ाते हुए कहा कि यह सब बातें कोरी अफवाह है मैं इन सुनी सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करता यदि कर्म दही इतनी ही पापनाशिनी है तो इस गधे के पापों का नाश कर इसे अश्व में परिवर्तित कर दे तो मैं मानूं उसने पास में ही घास खा रहे एक गधे की तरफ इशारा करते हुए कहा व्यंग कुतर्क और मूर्खतापूर्ण यह बातें साहेब दूलन दास का भक्त सुन रहा था साहेब दूलन दास के हाथों में दातुन देते हुए उसने निवेदन किया की साहब आप भक्तों के उद्धार के लिए उनके कष्टों के निवारण के लिए सदैव ही चिंतित रहते हो आपसे किसी का कष्ट तनिक भी नहीं देखा जाता परंतु लोग उपहास और कुतर्क करने से बाज नहीं आते साहेब के पूछने पर उसने पूरी वार्ता ज्यों की त्यों कह सुनाई भक्तों को लगा शायद साहब दूलन दास क्रोधित होंगे परंतु साहिब दूलन दास मुस्कुराने लगे और बोले जाकर उससे कह दो यह जगजीवनी सतनाम है यह तर्कों से परे है गधे को कर्म नदी में स्नान कराकर परीक्षा कर ले साहेब का भक्त पुनः उन लोगों के पास गया और बोला कि साहेब दूलन दास ने कहा है कि साहस है तो गधे को नहला कर परीक्षा कर लो फिर क्या था कई लोगों ने मिलकर गधे को कर्म दही में हांक दिया और प्रतीक्षा करने लगे कि आज तो वे साईं दूलन दास को पाखंडी साबित करके ही रहेंगे पर उनकी सोच से अलग अप्रत्याशित घटना घट गई वह गधा अश्व में परिवर्तित हो चुका था इतना बड़ा चमत्कार देख कर निंदकों को स्वयं की आंखों पर भरोसा नहीं हो पा रहा था और उन्हें अपनी कुतर्क और व्यंग पूर्ण बातों पर ग्लानि महसूस होने लगी उन लोगों ने साहेब दूलन दास से अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना की साहेब दूलन दास ने उन्हें क्षमा करते हुए सतनाम भक्ति का उपदेश दिया
सादर बंदगी
रामदीन दास की उम्र बढ़ना
समर्थ साहब जगजीवन दास जी का एक ब्राह्मण भक्त था नाम था राम दीनदास वह सदैव ही साहेब की सेवा में उपस्थित रहता था पर कुछ दिनों से स्वामी जी का वात्सल्य प्रेम उस पर अधिक ही उमड़ आया था कुछ तो ऐसी बात थी जो स्वामी जी स्वयं उससे कह नहीं पा रहे थे या कहना नहीं चाहते थे अत: एक दिन स्वामी जी ने राम दीनदास को बुलाकर आदेश दिया कि पास में ही दरियाबाद में पीराशाह जी रहते हैं जाओ उनके दर्शन कर आओ साधु संतों की सेवा और दर्शन करना चाहिए समर्थ स्वामी जगजीवन दास जी का आदेश मानकर रामदीनदास पीरा शाह जी से मिलने दरियाबाद पहुंचे और यह बताया कि समर्थ स्वामी जगजीवन दास जी ने भेजा है और कहा है कि आप के दर्शन कर आएं समर्थ स्वामी का नाम सुनकर पीराशाह ने बड़ी आव - भगत की पास बैठाया और बोले रामदीन दास आप की संपूर्ण आयु 30 वर्ष की है जिसमें 29 वर्ष 6 माह बीत चुके हैं और अब सिर्फ 6 माह ही बचे हैं इसलिए समर्थ साईं जगजीवन दास ने आपको साधु संतो के दर्शन करने के लिए आदेशित किया है रामददीनदास सारी बातें सुनकर बहुत दुखी हुए किंतु समर्थ स्वामी का आदेश और पीराशाह का परामर्श मानकर वह ख्याम दास जी के पास पहुंचे और पुरवा धाम होते हुए साहब देवीदास की भी चरण बंदगी की साहेब देवी दास ने कहा रामदीनदास तुम दुखी ना हो तुम धर्मे धाम जाओ साहेब दूलन दास के दर्शन करो बात मानकर रामदीनदास धर्मे धाम पहुंचे और साहेब दूलन दास को अपनी सारी व्यथा कथा कह सुनाई समर्थ साहेब दूलन दास ने स्वामी समर्थ की इच्छा जानकर रामदीन दास से कहा कौन कहता है कि तुम्हारी उम्र 30 वर्ष है तुम्हारी उम्र 130 वर्ष है ना विश्वास हो तो जाकर पीराशाह से पूछ लो रामदीन दास पुन: ख्याम दास के दर्शन कर साहब देवीदास के पास पहुंचे तो समर्थ देवी दास ने कहा तुम्हारे ऊपर तो सोमवंशी की अपार कृपा हो गई जाओ अब आनंद करो और फिर रामदीनदास पीरा साहब के पास पहुंचे तो पीरा शाह ने रामदीन दास को देखते ही कहा साहेब दूलन दास ने तुम्हारी उम्र 130 वर्ष कर दी है अब तुम्हें कोई भी भय नहीं है जाओ समर्थ स्वामी जगजीवन दास की सेवा करो और घर में आनंद पूर्वक रहो ऐसे अनेकों आख्यान समर्थ साहेब दूलन दास के बारे में मिलते हैं जब बड़े-बड़े पंडितों और संतों द्वारा कम उम्र का कहने पर समर्थ साहेब दूलन दास ने अपने भक्तों की उम्र बढ़ा दी यहां तक कि मरणो परांत तीसरे दिवस भी जीवन दान दिया
सादर बंदगी
कहानी ८
समर्थ साहेब दूलन दास अप्रतिम सौंदर्य के धनी थे चौड़े कंधे उन्नत हृदय प्रदेश बड़ी बड़ी आंखें नयन नक्श भी ऐसे थे कि बड़े ही मनोहर लगते थे आपकी चाल भी राजकुमारों की ही भांति थी आपका कद भी लंबा था और मजबूत भुजाएं देखकर ही किसी शूरवीर राजकुमार योद्धा का भ्रम हो जाता था कहते हैं एक बार समर्थ साहेब जगजीवन दास के दरबार में बहुत से साधु संत बैठे हुए थे और सत्संग आदि चल रहा था उसी समय साहब दूलन दास जी का सभा में प्रवेश हुआ यद्यपि सभी दूर से ही उन्हें आते हुए देख रहे थे साहेब दूलन दास की ऊंची कद काठी चौंड़ा कंधा और उन्नत हृदय प्रदेश के कारण सामान्य चाल में भी गर्बीलापन झलकता था अतः सभी साधु संत उन्हीं की तरफ ध्यानपूर्वक देख रहे थे जब साहेब दूलन दास ने लेट कर स्वामी जगजीवन दास की चरण वंदना की तो स्वामी जी ने कहा दुलारे विनम्रता मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण होता है और संतों को तो सदा ही विनीत भाव से सर झुका कर ही चलना चाहिए साहेब दूलनदास ने पूछा की प्रभु क्या मैं शीश झुका लूं समर्थ स्वामी जगजीवन दास ने कहा हां और बस फिर क्या था साहेब दूलन दास ने उसी समय से सर झुका लिया और आजीवन ही सिर ऊपर ना उठाया और सदा ही भक्ति भाव लिए गुरु का आदेश मानकर विनय धारण कर सिर झुकाए रखा इस कारण गर्दन की हड्डी दो तीन इंच ऊपर की ओर उठ गई थी
" सर झुकाय कै फिर ना उठावा
हाँड खींचि ऊपर उठि आवा "
आप ने अहं भावना ठाट बाट का पूरी तरह त्याग कर दिया यहां तक की सतलोक लीन होने से पहले आपने पूरे परिवार को भी निर्देशित किया कि गुंबद भी अहंकार का प्रतीक है मेरे साईं सतगुरु ने मुझे इस दोष से बचाए रखा अतः मेरी समाधि मंदिर में कभी गुंबद ना बनवाएं आप के आदेशानुसार आज भी आप की समाधि पर गुंबद नहीं है
सादर बंदगी
Sunday, March 3, 2019
Wednesday, February 27, 2019
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